HomeAboutPractice AreasFAQWritingToolsContact
Read this guide in English →

गिरफ़्तार व्यक्ति के अधिकार: परिवार के लिए पूरी चेकलिस्ट

लेखक: विक्रम सिंह कुशवाहा, अधिवक्ता (बार काउंसिल ऑफ़ दिल्ली, D/7747/2017) · अद्यतन: जुलाई 2026

जब पुलिस किसी को गिरफ़्तार करती है, तो वह ऐसी ताक़त इस्तेमाल करती है जिस पर संविधान ने जान-बूझकर अधिकारों की लगाम कसी है। ये अधिकार अपने-आप लागू नहीं होते — तब काम करते हैं जब परिवार इन्हें नाम लेकर माँगता है। पूरी सूची यह रही।

पुलिस को करना ही होगा

  1. कारण बताना — उसे भी, और आपको भी। गिरफ़्तारी के आधार बताने अनिवार्य हैं; कुछ क़ानूनों में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फ़ैसलों के बाद लिखित रूप में
  2. गिरफ़्तारी मेमो बनाना — समय, तारीख़, जगह, गवाह के दस्तख़त के साथ।
  3. परिवार को ख़बर करना — गिरफ़्तारी की और हिरासत की जगह की।
  4. 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना (रास्ते का समय छोड़कर)। इसके बिना आगे की हिरासत ग़ैरक़ानूनी है।
  5. मेडिकल जाँच करवाना — चोटें रिकॉर्ड में आनी चाहिए।
  6. वकील से मिलने देना — अपनी पसंद के वकील से, पूछताछ के दौरान भी।
  7. मुफ़्त क़ानूनी सहायता देना — अगर वकील की फ़ीस नहीं दे सकते, तो रिमांड कोर्ट में ही DLSA का वकील मिलता है। माँगने पर, अधिकार के तौर पर।
  8. 7 साल तक की सज़ा वाले अपराधों में सोच-समझकर गिरफ़्तारी — कारण दर्ज किए बिना नहीं (अरनेश कुमार दिशा-निर्देश)।
  9. ज़मानती अपराध में थाने से ही ज़मानत देना — बॉन्ड भरने पर।
  10. महिलाओं के लिए विशेष सुरक्षा — गिरफ़्तारी महिला पुलिसकर्मी द्वारा/की मौजूदगी में; सूर्यास्त के बाद केवल असाधारण हालात में, पूर्व अनुमति से; महिलाओं से पूछताछ उनके निवास पर।
  11. नाबालिगों के लिए अलग रास्ता — बच्चों के मामले किशोर न्याय बोर्ड (JJB) के ज़रिए चलते हैं, सामान्य रिमांड से नहीं; किशोरों के लिए ज़मानत ही नियम है।

पुलिस नहीं कर सकती

  1. मार-पीट या "नरम करना"। हिरासत में हिंसा अपराध है; हर चोट मेडिकल रिकॉर्ड में आनी चाहिए। हर मुलाक़ात में चोटों पर नज़र रखिए।
  2. बिना रिकॉर्ड की हिरासत — हर आना-जाना थाने की डायरी और केस डायरी में दर्ज होता है।
  3. रूटीन में हथकड़ी लगाना — हथकड़ी अपवाद है, जिसका दर्ज कारण चाहिए।
  4. इक़बालिया बयान के लिए मजबूर करना। अनुच्छेद 20(3): कोई भी अभियुक्त अपने ख़िलाफ़ गवाह बनने को मजबूर नहीं किया जा सकता। पुलिस के सामने किया गया इक़बालिया बयान अदालत में सबूत नहीं है।
  5. 24 घंटे में पेशी टालना — या टालने की "सहमति" लेना।
  6. बिना प्रक्रिया के सामान ज़ब्त करना — ज़ब्ती मेमो, गवाहों के साथ।
  7. महिलाओं या बच्चों को पूछताछ के लिए थाने बुलाना — जहाँ क़ानून घर पर पूछताछ कहता है।

हिरासत में भी जारी रहने वाले अधिकार

अगर अधिकार का उल्लंघन हुआ

लिखिए (तारीख़ें, नाम, चोटें, गवाह), अगली सुनवाई पर मजिस्ट्रेट को बताइए — रिमांड सुनवाई इसीलिए भी होती है — और मेडिकल रिकॉर्ड सँभालिए। जो नहीं करना है: थाने के अंदर बहस, या बिना पढ़े दस्तख़त।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या पुलिस बिना गिरफ़्तारी के पूछताछ कर सकती है? हाँ — लिखित पेशी नोटिस देकर। नोटिस पर हाज़िर होना गिरफ़्तारी नहीं है।

क्या हम उससे थाने में मिल सकते हैं? हिरासत की जगह बताना पुलिस की ड्यूटी है; मिलने की व्यवस्था अलग-अलग होती है — उसका वकील हमेशा मिल सकता है।

क्या पहले ही दिन ज़मानत हो सकती है? ज़मानती अपराध में हाँ — थाने में या पहली पेशी पर। ग़ैर-ज़मानती में ज़मानत की अर्ज़ी लगती है।

क्या उसे हर सवाल का जवाब देना होगा? अपने ख़िलाफ़ बयान देने को मजबूर नहीं किया जा सकता (अनुच्छेद 20(3)); झूठ भी नहीं बोलना चाहिए — इन दोनों के बीच की लकीर ही वकील का काम है।

वकील की फ़ीस नहीं है तो? रिमांड कोर्ट में DLSA का मुफ़्त वकील — अधिकार के तौर पर। कोर्ट स्टाफ़ से पूछिए।

परिवार में किसी की गिरफ़्तारी हुई है?

गिरफ़्तारी के बाद के पहले 24 घंटे क़ानून की सख़्त घड़ी से बंधे हैं — पेशी, रिमांड, ज़मानत। पेशी से पहले साफ़ मार्गदर्शन लीजिए।

अभी WhatsApp कीजिए परामर्श बुक कीजिए — ₹1,500

यह लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है; यह कानूनी सलाह नहीं है और इससे अधिवक्ता-मुवक्किल संबंध नहीं बनता। अंतिम समीक्षा: 9 जुलाई 2026।