दिल्ली में गिरफ़्तारी: परिवार के लिए पूरी गाइड — थाने से ज़मानत तक
लेखक: विक्रम सिंह कुशवाहा, अधिवक्ता (बार काउंसिल ऑफ़ दिल्ली, D/7747/2017) · अद्यतन: जुलाई 2026
परिवार के किसी सदस्य को पुलिस ले गई है। आप डरे हुए हैं, पता नहीं वह कहाँ है, और हर कोई अलग सलाह दे रहा है। यह गाइड आपको आगे का पूरा रास्ता दिखाती है — घंटे-दर-घंटे, अदालत-दर-अदालत।
सबसे पहले तीन बातें:
- वह ग़ायब नहीं किया जा सकता। पुलिस को बताना होगा कि वह कहाँ है, और 24 घंटे के भीतर उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होगा। यह संवैधानिक अधिकार है, किसी की मेहरबानी नहीं।
- अभी से सब कुछ लिखना शुरू कीजिए। उठाने का समय, थाने का नाम, वर्दी पर लिखे नाम, क्या कहा गया। आज रात की छोटी-सी पर्ची महीनों बाद बड़ा काम करती है।
- किसी काग़ज़ पर दस्तख़त मत कीजिए, गेट पर किसी को पैसे मत दीजिए, और दलालों के "सेटलमेंट" के झाँसे में मत आइए। हर हवालात के बाहर शॉर्टकट बेचने वाले खड़े होते हैं। शॉर्टकट कोई नहीं है — प्रक्रिया है, और प्रक्रिया आपके साथ है, जितना आप सोचते हैं उससे ज़्यादा।
क़दम 1 — गिरफ़्तारी और थाने की पुष्टि
गिरफ़्तार व्यक्ति का अधिकार है कि उसके परिवार या मित्र को गिरफ़्तारी और हिरासत की जगह की सूचना दी जाए। पूछिए:
- गिरफ़्तारी है या सिर्फ़ पूछताछ का बुलावा? लिखित पेशी नोटिस (पुराना "41A नोटिस") गिरफ़्तारी नहीं है।
- FIR नंबर और धाराएँ। गिरफ़्तारी के आधार जानने का हक़ है; कुछ मामलों में लिखित रूप में।
- FIR की कॉपी — FIR सार्वजनिक दस्तावेज़ है (संवेदनशील श्रेणियों को छोड़कर) और दिल्ली पुलिस की वेबसाइट पर अपलोड होती है। कॉपी सँभालकर रखिए।
क़दम 2 — अपराध किस तरह का है?
आगे का सारा रास्ता इसी से तय होता है:
- ज़मानती (bailable): ज़मानत अधिकार है। बॉन्ड भरने पर थाने से ही रिहाई होनी चाहिए; न हो तो पहली पेशी पर मजिस्ट्रेट से।
- ग़ैर-ज़मानती (non-bailable): ज़मानत अपने-आप नहीं मिलती — अदालत मामले को तौलकर देती है। यहीं वकील की असली ज़रूरत है, और यहीं यह गाइड।
FIR की धाराएँ पढ़िए — गिरफ़्तारी के ड्रामे से अंदाज़ा मत लगाइए।
क़दम 3 — पहले 24 घंटे
विस्तार से साथ वाली गाइड में (गिरफ़्तारी के बाद के पहले 24 घंटे), पर ढाँचा यह है: गिरफ़्तारी मेमो और गवाह → मेडिकल जाँच → वकील से मुलाक़ात का अधिकार → 24 घंटे के भीतर उस ज़िले के मजिस्ट्रेट के सामने पेशी।
कौन-सी अदालत? थाने पर निर्भर है — हमारा थाना → कोर्ट लुकअप टूल इस्तेमाल कीजिए। दिल्ली के छह परिसर: तीस हज़ारी, कड़कड़डूमा, रोहिणी, साकेत, द्वारका, पटियाला हाउस (सीबीआई/सांसद-विधायक मामले राउज़ एवेन्यू में)।
क़दम 4 — पेशी (रिमांड) की सुनवाई
दस मिनट की यह सुनवाई परिवार का पहला असली मौक़ा है। मजिस्ट्रेट तय करता है: पुलिस हिरासत (और पूछताछ), न्यायिक हिरासत (जेल), या रिहाई। वकील मौजूद रहे — अपना, या कोर्ट में ही मिलने वाला DLSA का मुफ़्त वकील। माँगिए, यह अधिकार है। बिना वकील की रिमांड सुनवाई से बुरा कुछ नहीं।
क़दम 5 — ज़मानत के रास्ते
- थाने/मजिस्ट्रेट से ज़मानत — ज़मानती अपराधों में, अधिकार के तौर पर।
- रेगुलर बेल — गिरफ़्तारी के बाद मजिस्ट्रेट या सत्र अदालत में अर्ज़ी।
- अग्रिम ज़मानत (anticipatory bail) — गिरफ़्तारी की आशंका पर, गिरफ़्तारी से पहले — सत्र अदालत या हाई कोर्ट।
- अंतरिम ज़मानत (interim bail) — मुख्य अर्ज़ी लंबित रहने के दौरान थोड़े समय की रिहाई।
- डिफ़ॉल्ट बेल — पुलिस 60 या 90 दिन (अपराध के अनुसार) में चार्जशीट दाख़िल न करे, तो ज़मानत अटल अधिकार बन जाती है। परिवार यह हक़ सिर्फ़ दिन न गिनने से खो देते हैं। दिन गिनिए।
अदालत ज़मानत पर क्या देखती है — आरोप की गंभीरता, भागने का ख़तरा, गवाहों/सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका, पुराना रिकॉर्ड — और यह सिद्धांत कि ज़मानत नियम है, जेल अपवाद: ताज़ा फ़ैसलों समेत साथ की गाइड में।
क़दम 6 — ज़मानतदार (surety) और बॉन्ड
ज़्यादातर ज़मानत आदेशों में निजी बॉन्ड और एक-दो ज़मानतदार चाहिए — पहचान, निवास और हैसियत के प्रमाण के साथ (संपत्ति के काग़ज़, बैंक स्टेटमेंट, सैलरी स्लिप)। ये काग़ज़ अर्ज़ी लंबित रहते हुए ही तैयार कीजिए — मंज़ूर ज़मानत भी काग़ज़ों के इंतज़ार में दिनों तक अटकती है।
क़दम 7 — अगर न्यायिक हिरासत में रहना पड़ा
दिल्ली की जेलें: तिहाड़, रोहिणी, मंडोली। मुलाक़ात (ई-मुलाक़ात बुकिंग), कैंटीन के लिए पैसे जमा करना, कपड़ों के नियम — जेल प्रशासन के अनुसार। लंबी हिरासत काट चुके विचाराधीन क़ैदियों के लिए रिहाई के वैधानिक प्रावधान हैं — पहली बार के अभियुक्तों के लिए और उदार।
आज रात की चेकलिस्ट
- थाना, FIR नंबर, धाराएँ — लिखिए।
- वकील को ख़बर कीजिए — या पेशी पर DLSA का वकील माँगिए।
- जुटाइए: उसका पहचान-पत्र, आपके पहचान-पत्र, दस्तावेज़ों समेत दो संभावित ज़मानतदार।
- FIR की कॉपी सँभालिए।
- पहली रिमांड से 60/90 दिन डायरी में गिनिए।
- मुलाक़ात में फ़ोन पर केस की बातें मत कीजिए।
- "जज को जानने वाले" किसी भी आदमी को पैसे मत दीजिए।
परिवार में किसी की गिरफ़्तारी हुई है?
गिरफ़्तारी के बाद के पहले 24 घंटे क़ानून की सख़्त घड़ी से बंधे हैं — पेशी, रिमांड, ज़मानत। पेशी से पहले साफ़ मार्गदर्शन लीजिए।
यह लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है; यह कानूनी सलाह नहीं है और इससे अधिवक्ता-मुवक्किल संबंध नहीं बनता। अंतिम समीक्षा: 9 जुलाई 2026।